कल्कि जयंती ( १२ अगस्त २०१३ विशेष )

भगवान विष्णु के अब तक नौ अवतार हो चुके हैं और दसवें अवतार की प्रतीक्षा चल रही है। पुराणों में भगवान के दसवें अवतार की जो तिथि बतायी गयी है उसके अनुसार भगवान सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को जन्म लेंगे।

यह पावन तिथि इस वर्ष आज है। श्रीमद्भागवत पुराण के बारहवें स्कंद में लिखा है कि भगवान का कल्कि अवतार कलियुग की समाप्ति और सतयुग के संधि काल में होगा। इनके जन्म स्थान के विषय में श्रीमद्भागवत, स्कंध पुराण और कल्कि पुराण में बताया गया है कि कल्कि भगवान उत्तर प्रदेश में गंगा और रामगंगा के बीच बसे मुरादाबाद के संभल ग्राम में जन्म लेंगे।

भगवान के दसवें अवतार से जुड़ी रोचक बातें


पुराणों के अनुसार इनके पिता का नाम विष्णुदत्त होगा। विष्णुदत्त भगवान विष्णु के परम भक्त होंगे। जबकि गुरू गोविंद सिंह जी ने दशम नामक ग्रंथ में लिखा है कि कल्कि भगवान का जन्म कश्मीर में बिशन दत्त नाम के व्यक्ति के घर होगा। बारह वर्ष की उम्र में कल्कि भगवान त्रिकोता नामक कन्या से विवाह करेंगे।

भगवान के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति के विषय में दक्षिण भारतीय ज्योतिषियों की गणना कहती है कि भगवान उस समय जन्म लेंगे जब चन्द्रमा धनिष्ठा नक्षत्र और कुंभ राशि में होगा। सूर्य तुला राशि में स्वाति नक्षत्र में गोचर करेगा। गुरू स्वराशि धनु में और शनि अपनी उच्च राशि तुला में विराजमान होगा। वर्तमान में शनि अपनी उच्च राशि तुला में ही गोचर कर रहा है।

युग परिवर्तनकारी भगवान श्री कल्कि के अवतार का प्रायोजन विश्व कल्याण है। भगवान का यह अवतार ‘‘निष्कलंक भगवान’’ के नाम से भी जाना जायेगा। श्रीमद् भागवत महापुराण में विष्णु के अवतारों की कथाएं विस्तार से वर्णित हैं। इसके बारहवें स्कन्ध के द्वितीय अध्याय में भगवान के कल्कि अवतार की कथा कुछ विस्तार से दी गई, कहा गया है कि सम्भल ग्राम में विष्णुयश नामक श्रेष्ठ ब्राह्मण के पुत्र के रूप में भगवान कल्कि का जन्म होगा। वे देवदत्त नाम के घोड़े पर आरूढ़ होकर अपनी कराल करवाल (तलवार) से दुष्टों का संहार करेंगे तभी सतयुग का प्रारम्भ होगा।

‘‘ सम्भल ग्राम, मुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनःभवने विष्णुयशसः कल्कि प्रादुर्भाविष्यति।। 

भगवान श्री कल्कि सत्य सनातन धर्म में प्राण पुरूष की भाँति स्थान रखते हैं। कलियुग में सतयुग की ओर युग की धारा को मोड़ने की सामथ्र्य भगवान के ऐसे ही तेजस्वी रूप में संभव है। आज मनुष्य हौर उसके द्वारा बुना हुआ सामाजिक ताना बाना इन सभी बुराईयों से ग्रसित हो गये हैं। जहाँ धर्म, सत्य, न्याय, कर्तव्य, मातृ-पितृ भक्ति, गौसेवा, ज्ञान, सुसंस्कार, वैदिक गरिमा, सच्चे ब्रह्मानुरागी और संतोषी ब्राह्मण और उनका सम्मान करने वाले वीर और आन वाले क्षत्रिय और समाज के हितैषी, दानी और उदार वैश्य, कर्तव्य पथ पर चलने वाले शूद्र और देवी शक्ति की प्रतीक नारि शुचिता पर टिकना बहुत कठिन हो गया है। आज धर्म के नाम पर तथाकथित धर्मगुरू अपने शिष्यों और भक्तों को ईश्वर के वास्तविक रूप का ज्ञान कराने की बजाए स्वय ईश्वर बन बैठे हैं। जब गुरू ही ईश्वर हो जाए, तब कैसे और कौन करायेगा हमें ईश्वर की पहचान ? अधर्म और गुरूडम को, असत्य और अन्याय को और अविश्वास और अश्रद्धा को समाप्त करने भगवान श्री विष्णु का अन्तिम अवतार सम्भल में होगा। समस्त विश्व का कल्याण इस अवतार का प्रायोजन है।

भगवान श्री कल्कि निष्कलंक अवतार हैं। उनके पिता का नाम विष्णुयश और माता का नाम सुमति होगा। उनके भाई जो उनसे बड़े होंगे क्रमशः सुमन्त, प्राज्ञ और कवि नाम के नाम के होंगे। याज्ञवलक्य जी पुरोहित और भगवान परशुराम उनक गुरू होंगे। भगवान श्री कल्कि की दो पत्नियाँ होंगी - लक्ष्मी रूपी पद्मा और वैष्णवी शक्ति रूपी रमा। उनके पुत्र होंगे - जय, विजय, मेघमाल तथा बलाहक।

भगवान का स्वरूप (सगुण रूप) परम दिव्य एवम् ज्योतिमय होता है। उनके स्परूप की कल्पना उनके परम अनुग्रह से ही की जा सकती है। भगवान श्री कल्कि अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक हैं। शक्ति पुरूषोत्तम भगवान श्री कल्कि अद्वितीय हैं। भगवान श्री कल्कि दुग्ध वर्ण अर्थात् श्वेत अश्व पर सवार हैं। अश्व का नाम देवदत्त है। भगवान का रंग गोरा है, परन्तु क्रोध में काला भी हो जाता है। भगवान पीले वस्त्र धारण किये हैं। प्रभु के हृदय पर श्रीवत्स का चिह्न अंकित है। गले में कौस्तुभ मणि सुशोभित है। भगवान पूर्वाभिमुख व अश्व दक्षिणामुख है। भगवान श्री कल्कि के वामांग में लक्ष्मी (पद्मा) और दाएं भाग में वैष्णवी (रमा) विराजमान हैं। पद्मा भगवान की स्वरूपा शक्ति और रमा भगवान की संहारिणी शक्ति हैं। भगवान के हाथों में प्रमुख रूप से नन्दक व रत्नत्सरू नामक खड्ग (तलवार) है। शाऽं्ग नामक धनुष और कुमौदिकी नामक गदा है। भगवान कल्कि के हाथ में पांचजन्य नाम का शंख है। भगवान के रथ अत्यन्त सुन्दर व विशाल हैं। रथ का नाम जयत्र व गारूड़ी है। सारथी का नाम दारूक है। भगवान सर्वदेवमय व सर्ववेदमय हैं। सब उनकी विराट स्वरूप की परिधि में हैं। भगवान के शरीर से परम दिव्य गंध उत्पन्न होती है जिसके प्रभाव से संसार का वातावरण पावन हो जाता है।

सूची

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